Nari Shringar Nazeer Akbarabadi | नारी श्रृंगार नज़ीर अकबराबादी

नारी श्रृंगार नज़ीर अकबराबादी

  1. मेंहदी-1
    तुमने हाथों में सनम जब से लगाई मेंहदी।
    रंग में हुस्न के फूली न समाई मेंहदी॥1॥
    किस तरह देखके दिल पर न क़यामत गुज़रे।
    एक तो हाथ ग़ज़ब जिस पै रचाई मेंहदी॥2॥
    दिल धड़कता है मेरा आज खु़दा खैर करे।
    देख करती है यह किस किससे लड़ाई मेंहदी॥3॥
    दिल तड़फता है मेरा जिससे कि मछली की तरह।
    इस तड़ाके की वह चंचल ने लगाई मेंहदी॥4॥
    हुस्न मेंहदी ने दिया आपके हाथों को बड़ा।
    ऐसे जब हाथ थे जिस हक़ ने बनाई मेंहदी॥5॥
    क्या खता हमसे हुई थी कि हमें देखकर आह।
    तुमने ऐ जान दुपट्टा में छिपाई मेंहदी॥6॥
    ग़श हुए, लोट गए, कट गए, बेताब हुए।
    उस परी ने हमें जब आके दिखाई मेंहदी॥7॥
    देखे जिस दिन से वह मेंहदी भरे हाथ उसके “नज़ीर”।
    फिर किसी की हमें उस दिन से न भाई मेंहदी॥8॥
  2. मेंहदी-2
    मियां यह किस परी के हाथ पर आशिक़ हुई मेंहदी।
    कि बालिन में हुई है सुर्ख़ ज़ाहिर में हरी मेंहदी॥
    करे खूनीं दिलों से क्यूं न हर दम हमसरी मेंहदी।
    कही, कुचली गई, टूटी, छनी, भीगी, पिसी, मेंहदी॥
    जब इतने दुख सहे तन उसके हाथों में लगी मेंहदी॥1॥

हिना की मछलियां उसके कफ़े रंगी में जो देखीं।
निगाह में आनकर उस दम अ़जब रंगीनियां झमकीं॥
कहूं क्या-क्या मैं उस मेंहदी भरे हाथों की अब तेज़ी।
शफ़क़ में डूब कर जूं पंजए-ख़ुरर्शीद हो रंगी॥
चमक में रंग में सुर्खी में कुछ ऐसी ही थी मेंहदी॥2॥

हतेली चांद सी हो जिन की और नाखु़न सितारे हों।
वह पतली उंगलियां जिनसे नज़ाकत के सहारे हों॥
तलाईनुक़रई हीरों के छल्लों के करारे हों।
जो गोरे गोरे हाथ और नर्मोनाजु़क प्यारे प्यारे हों॥
तो बस वह जान हैं मेंहदी की और उनका है जी मेंहदी॥3॥

वह पहुंचे जिनमें पहुंची सो नियाज़ोइज्ज़ से पहुंची।
और इन पोरों के मिलने से बढ़ी है शान छल्लों की॥
अ़जब तुम भीगती हो और अबस पत्थर से हो पिसती।
कफ़ेनाजुक पर उसके तो है असली रंग की सुर्ख़ी॥
तुम्हारी दाल यां गलती नहीं सुनती हो बी मेंहदी॥4॥

जो देखा मैंने उस मेंहदी भरे हाथों का हिल जाना।
अंगूठी बांक छल्ले आरसी का फिर नज़र आना॥
मेरा दिल हो गया उस शम्मा रू चंचल का परवाना।
भला क्यूंकर न हूं यारो मैं उसको देख दीवाना॥
कि होवें जिस परी के परी हाथ और परी मेंहदी॥5॥

यकायक देखकर मुझको वह चंचल नाज़नी भरमी।
उधर मैंने भी देखा खू़ब उसको करके बेशर्मी॥
कहूं क्या क्या मैं उसकी अब नज़ाकत वाह और नरमी।
हुई यां तक उसे मेरी निगाहे गर्म की गर्मी॥
कि दस्ती पा में उसके देर तक मसली गई मेंहदी॥6॥

कहां तक गुलइज़ारों के भी हाथों को रसाई है।
कि जिनके वास्ते अल्लाह ने मेंहदी बनाई है॥
यह सुर्खी लाल ने पंजएमरजां ने पाई है।
“नज़ीर” उस गुलबदन ने और ही मेंहदी लगाई है॥
मुबारक बाद अच्छा वाह वा ख़ासी रची मेंहदी॥7॥
(बालिन=गुप्त रूप, हमसरी=बराबरी, पंजए-ख़ुरर्शीद=
सूर्य का हाथ, तलाईनुक़रई=सोने-चांदी की, नर्मोनाजु़क=
अत्यन्त कोमल, नियाज़ोइज्ज़=नम्र निवेदन, कफ़ेनाजुक=
कोमल हाथ, पंजएमरजां=मूँगे के हाथ)

  1. हिना (मेंहदी)
    कुछ दिल फ़रेब हाथ वह कुछ दिल रुवा हिना।
    लगती है उस परी की अ़जब खु़शनुमा हिना॥
    देखे हैं जब से दिल ने हिनाबस्ता उसके हाथ।
    रातों को चौंक पड़ता है कह कर हिना हिना॥
    है सुर्ख़ यां तलक कि जो छल्दे हैं नक़रई।
    करती है उसके हाथ में, उनको तिला हिना॥
    यह फ़नदकें नहीं मेरे क़ातिल के हाथ में।
    होती है पोर पोर पै उसके फ़िदा हिना॥
    खू़ने शफ़क़ में पंजए खु़र्शीद रश्क से।
    डूबा ही था अगर वह न लेता छुपा हिना॥
    गुरफ़े से हाथ खोल के और फिर लिया जो खींच।
    बिजली सी कुछ चमक गई काफ़िर बला हिना॥
    शब के खि़लाफ़ेवादा का जब बन सका न उज्ऱ।
    नाचार फिर तो हंस दिया और दिखा दी हिना॥
    कल मुझसे हंस के उस गुले ख़ूबी ने यूं कहा।
    पांव में तू ही आज तो मेरे रचा हिना॥
    वह छोटी प्यारी उंगलियां वह गोरे गोरे पांव।
    हाथों में अपने ले, मैं लगाने लगा हिना॥
    उस वक़्त जैसी निकलीं मेरी हसरतें “नज़ीर”।
    इन लज़्ज़तों को दिल ही समझता है या हिना॥
    (हिनाबस्ता=मेंहदी लगे, गुरफ़े=खिड़की,
    शब=रात, खि़लाफ़ेवादा=वायदे के विरुद्ध,
    उज्ऱ=बहाना,कारण)
  2. मोती-1
    रहे हैं अब तो पास उस शोख़ के शामो सहर मोती।
    ज़बीं पर मोती और बेसर में मोती मांग पर मोती॥
    इधर जुगनू, उधर कुछ बालियों में जलवागर मोती।
    भरे हैं उस परी में अब तो यारो सर बसर मोती॥
    गले में कान में नथ में जिधर देखो उधर मोती॥

कोई उस चांद से माथे के टीके में उछलता है।
कोई बुन्दों से मिलकर कान की नर्मों में मिलता है॥
लिपट कर धुगदुगी में कोई सीने पर मचलता है।
कोई झुमकों में झूले हैं कोई बाली में हिलता है॥
यह कुछ लज़्ज़त है जब अपना छिदावे है जिगर मोती॥

कभी वह नाज़ में हंसकर जो कुछ बातें बनाती है।
तो एक एक बात में मोती को पानी में बहाती है॥
अदाओ नाज में चंचल अ़जब आलम दिखाती है।
वह सुमरन मोतियों की उंगलियों में जब फिराती है॥
तो सदके उसके होते हैं पड़े हर पोर पर मोती॥

ग़लत है उस लबे-रंगीं को बर्गे-गुल से क्या निस्बत।
कि जिनकी है अक़ीक़ और पन्ने और याकू़त को हसरत॥
उदाहट कुछ मिसी की, और कुछ उस पर पान की रंगत।
वह हंसती है तौ खिलता है जवाहर ख़ानऐ कु़दरत॥
इधर लाल और उधर नीलम, इधर मरजां उधर मोती॥

कभी जो बाल बाल अपने में वह मोती पिरोती है।
नज़ाकत से अर्क़ की बूंद भी मुखड़े को धोती है॥
बदन भी मोती, सर ता पांव से पहने भी मोती है।
सरापा मोतियों का फिर तो एक गुच्छा वह होती है॥
कि कुछ वह खु़श्क मोती, कुछ पसीने के बह तर मोती॥

गले में उसके जिस दम मोतियों के हार होते हैं।
चमन के गुल सब उसके वस्फ़ में मोती पिरोते हैं॥
न तनहा रश्क से क़तराते शबनम दिल में रोते हैं।
फ़लक पर देख कर तारे भी अपना होश खोते हैं॥
पहन कर जिस घड़ी बैठे हैं वह रश्के क़मर मोती॥

वह जेवर मोतियों का वाह, और कुछ तन वह मोती सा।
फिर उस पर मोतिया के हार, बाजू बंद और गजरा॥
सरापा जे़बो ज़ीनत में वह अ़ालम देख कर उसका।
जो कहता हूं अरे ज़ालिम, टुक अपना नाम तो बतला॥
तो हंसकर मुझसे यूं कहती है वह जादू नज़र ‘मोती’॥

कड़े पाजे़ब, तोड़े जिस घड़ी आपस में लड़ते हैं।
तो हर झनकार में किस-किस तरह बाहम झगड़ते हैं॥
किसी दिल से बिगड़ते हैं, किसी के जी पे अड़ते हैं।
कड़े सोने के क्या मोती भी उसके पांव पड़ते हैं॥
अगर बावर नहीं देखो हैं उसकी कफ़्श पर मोती॥

ख़फ़ा हो इन दिनों कुछ रूठ बैठी है जो हम से वह।
तो उसके ग़म में जो हम पर गुजरता है सो मत पूछो॥
चले आते हैं आंसू, दिल पड़ा है हिज्र में ग़श हो।
वह दरिया मोतियों का हम से रूठा हो तो फिर यारो॥
भला क्यूंकर न बरसावे हमारी चश्मेतर मोती॥

शफ़क इत्तिफ़ाक़न जैसे सूरज डूब कर निकले।
व या अब्रे गुलाबी में कहीं बिजली चमक जावे॥
बयां हो किस तरह से, आह उस आलम को क्या कहिये।
तबस्सुम की झलक में यूं झमक जाते हैं दांत उसके॥
किसी के यक बयक जिस तौर जाते हैं बिखर मोती॥

हमें क्यूंकर परीज़ादों से बोसों के न हों लहने।
जड़ाऊ मोतियों के इस सग़जल पर बारिये गहने॥
सखु़न की कुछ जो उसके दिल में है उल्फ़त लगी रहने।
“नज़ीर” इस रेख़्ता को सुन वह हंस कर यूं लगी कहने॥
अगर होते तो मैं देती तुम्हें एक थाल भर मोती॥
(जलवागर=शोभायमान, लबे-रंगीं=सुरंग होंठ,
बर्गे-गुलगुलाब की पंखुड़ी, निस्बत=सम्बन्ध,
जवाहर ख़ानऐ कु़दरत=प्रकृति का रत्नागार,
मरजां=मूँगा, शबनम=ओस की बूंदें, बाहम=
परस्पर, कफ़्श=पादुका,जूता, चश्मेतर=सजल
नयन, शफ़क=शाम की लालिमा, इत्तिफ़ाक़न=
अकस्मात्, तबस्सुम=मुस्कान)

  1. मोती-2
    परीज़ादों में है नामे खु़दा जिस शान पर मोती।
    कोई ऐसा नहीं मोती, मगर मोती, मगर मोती॥
    झमक जावे निगाहों में जवाहर ख़ानए कु़दरत।
    जो खा कर पान और मल कर किसी हंस दे मगर मोती॥
    रगेगुल इस कमर के सामने भरती फिरे पानी।
    लचक में और नज़ाकत में जो रखती है कमर मोती॥
    इधर हर एक मकां पर मोतियों के ढेर हो जावें।
    अदा से नाज़ से हंस कर क़दम रक्खे जिधर मोती॥
    सदा सुनकर हर एक की चश्म से मोती टपकते हैं।
    फ़क़त बैठे हो गाने में यह रखती है असर मोती॥

अ़जब नक़शा अ़जब सज धज अ़जब आंखें अ़जब नज़रें।
बड़े ताले बड़ी किस्मत जो देखे एक नज़र मोती॥
शरफ़ पन्ने को पन्ने पर शरफ़ हीरे को हीरे पर।
शरफ़ शरफन को लालों पर, रही है जिसके घर मोती॥
हर एक दन्दान मोती, हुस्न मोती, नाम भी मोती।
सरापा चश्म मोती, तिस पै पहने सरबसर मोती॥
जो खू़बां बेनज़ीर इस दौर में हैं नाजुको रंगी।
शरफ़ रखती है यारो, अब तो सबके हुस्न पर मोती॥
(रगेगुल=फूल की नस, ताले=भाग्य, शरफ़=श्रेष्ठता,
सरापा=सर से पैर तक, खू़बां=सुन्दरियाँ)

  1. बाला-1
    अ़जब ढंग से चमकता है वह बाला उसके बाला सा।
    कि हर झोंक में होता है वह बिजली का उजाला सा॥

न बाला ही फ़क़त कुछ दिल को भटकाने में डाले है।
जो देखा खूब तो बाली भी बहलगती है बाला सा॥

वह बाला सा कद उसका और वह बाला कान का यारो।
करे हैं उस परी के बाले जोबन को दोबाला सा॥

न झमकों ही की झोंकें तीर सी लगती हैं सीने में।
करनफूलों की नोंकें भी लगा जाती हैं भाला सा॥

मुझे कल इत्तफ़ाकन देख उस ऐयार ने पूछा?
कि उसकी चश्म से बहता है क्यों अश्कों का नाला सा॥

अगर चाहे कि हमको दाम में लावे तो क्या कु़दरत।
कहां हम हुस्न के शेर और कहां मकड़ी का जाला सा॥

किसी ने कह दिया उससे “नज़ीर” इसको ही कहते हैं।
परों पर आज परियों के हैं उसके इश्क का लाला॥

जहां गोरा बदन और चांद सा रुख़सार होता है।
तो वां यह शख़्स भी रहता है उसके गिर्द हाला सा॥

बड़े हैं खू़बरू हैं इस से डरते हैं तो तुम क्या हो।
तुम्हें तो जानता है एक हलुए के निबाला सा॥

इसे हलका न जानो तुम अजी साहब क़यामत है।
यह ठिगना सा, यह दुबला सा, यह सूखा सा यह काला सा॥

  1. बाला-2
    कुछ आप परी कुछ वह परी कान का बाला।
    हो नामे खु़दा क्यों न तेरा हुस्न दो बाला॥

है वह तो मेरी जान कि आगे को तेरे बन कर।
चलता है जिलों में तेरे परियों का रिसाला॥

बाली तो पड़ी कान में छेदे कि कलेजा।
बाले की तिलावट ने तो बस मार ही डाला॥

सूरज को शफ़क़ शाम के पर्दे में छिपा ले।
तू ओढ़ के निकले जो कभी सुर्ख़ दुशाला॥

आँखों में चमकता है सितारा सा सहर को।
सीने की सफा पर तेरे जुगनूं का उजाला॥

पत्ती की जमावट की तरह और है काफ़िर।
चोटी की गुदावट का कुछ आलम है निराला॥

मांगा जो मैं बोसा तो मटक कर कहा है वाह।
क्या तू ही नया है मेरा एक चाहने वाला॥

अँगिया की खिचावट ने दिल खींच के बांधा।
पर जाली की कुर्ती ने बड़े जाल में डाला॥

पहुंचा जो मेरा हाथ शिकम पर तो यह समझा।
मख़मल है मलाई है या रेशम का है गाला॥

इस बात को पूछा तो लगी कहने झमक कर।
चल दूर मेरी जूती यह सहती है कसाला॥

तू इश्क में बूढ़ा भी हो तो भी “नज़ीर” आह।
अब तक तेरी बातों में टपकता है छिनाला॥

  1. बाला-3
    अब तो हर शोख़ परीवश ने संभाला बाला।
    हर कहीं ज़ोर दिखाता है उजाला बाला।
    सबके बालों से तुम्हारा है निराला बाला।
    तुमने जिस दिन से सनम कान में डाला बाला।
    हो गया चांद से रुख़सार का हाला बाला॥

आई वह शोख़ जो कल नाज़ो अदा से इस जा।
थी वह सज धज कि परी देख के हो जाये फ़िदा।
फुरतियां ग़म्ज़ों की अब उसके कहूँ मैं क्या-क्या।
नौके मिज़गां को ख़बर होने न दी आह ज़रा।
दिल को यूं उसकी निगाह ले गई बाला बाला॥

चाल चलती है अ़जब आन से यह नाज भरी।
हर क़दम पर मेरे सीने में है ठोकर लगती।
मस्तियां वाह मैं क्या-क्या कहूं इस जोबन की।
जब हिलाती है सुराही सी वह गर्दन अपनी।
नशए हुस्न को करता है दो बाला बाला॥।

उसकी पलकों की जो लगती है मेरे दिल में नोक।
ऐ दिल उस शोख़ के तू बाले से जोबन को न टोक।
आह सीने में करूं अपने मैं किस किस की रोक।
एक तो क़हर है कानों में किरन फूल की झोक।
तिस पे काफ़िर है जिगर छेदने बाला बाला॥

बाले भटकावे के अन्दाज थे करते क्या क्या।
जुज़ खि़जल होने के कुछ जी न बन आता था।
यह जो हर झोंक में है अपनी झलक दिखलाता।
ऐ दिल उस बाले की हरगिज़ तू लगावट पे न जा।
तुझको बतलावेगा बाली पै यह बाला बाला॥

जब वह बन ठन के निकलते हैं बना हुस्न की शान।
उसकी हर आन पे होती है फ़िदा मेरी जान।
तर्ज़ चितवन की लगावट में दिखा सहरे निशान।
वह भी क्या आन का ढब है कि दिखाता हर आन।
कान के पास से सरका के दोशाला बाला॥

हो गया जब से दिल उस शोख़ के बाले में असीर।
कोई बन आती नहीं वस्ल की उसके तदबीर।
यां तक उस बाले ने की है मेरे जी में तासीर।
अब तो रह रह के मेरा दिल यही कहता है “नज़ीर”।
एक नज़र चलके मुझे उसका दिखा ला बाला॥
(परीवश=अप्सरा जैसी सुन्दर, फ़िदा=मुगध,
जुज़=अतिरिक्त्, खि़जल=लज्जित होना,
सहरे=जादुई, असीर=कै़द, वस्ल=मिलन)

  1. अंगिया
    सफ़ाई उसकी झलकती है गोरे सीने में।
    चमक कहां है यह अलमास के नगीने में॥
    न तूई है, न किनारी, न गोखरू तिस पर।
    सजी है शोख़ ने अंगिया बनत के मीने में॥
    जो पूछा मैं कि “कहां थी” तो हंस के यों बोली।
    मैं लग रही थी इस अंगिया मुई के सीने में॥
    पड़ा जो हाथ मेरा सीने पर तो हाथ झटक।
    पुकारी आग लगे आह! इस करीने में॥
    जो ऐसा ही है तो अब हम न रोज़ आवेंगे।
    कभू जो आए तो हफ़्ते में या महीने में॥
    कभू मटक, कभू बस बस, कभू प्याला पटक।
    दिमाग करती थी क्या क्या शराब पीने में॥
    चढ़ी जो दौड़ के कोठे पे वह परी इक बार।
    तो मैंने जा लिया उसको उधर के ज़ीने में॥
    वह पहना करती थी अंगिया जो सुर्ख़ लाही की।
    लिपट के तन से वह तर हो गई पसीने में॥
    यह सुर्ख़ अंगिया जो देखी है उस परी की “नज़ीर”।
    मुझे तो आग सी कुछ लग रही है सीने में॥
  2. इज़ारबन्द (कमरबन्द)
    छोटा बड़ा न कम, न मंझौला इज़ार बंद।
    है उस परी का सबसे अमोला अज़ार बंद॥
    हर एक क़दम पे शोख़ के ज़ानू के दरमियां।
    खाता है किस झलक से झकोला इज़ार बंद॥
    गोटा, किनारी, बादला, मुक़्के़श के सिवा।
    थे चार तोले मोती, जो तोला इज़ार बंद॥
    हंसने में हाथ मेरा कहीं लग गया तो वह।
    लौंडी से बोली “जा मेरा धोला इज़ार बंद”॥
    “और धो नहीं, तो फेंक दे, नापाक हो गया”।
    वह दूसरा जो है, सो पिरो ला इज़ार बंद॥
    एक दिन कहा यह मैंने कि ऐ जान, आपका।
    हमने कभी मजे़ में न खोला इज़ार बंद॥
    सुनकर लगी यह कहने कि “ऐ वा छड़े च खु़श”।
    ऐसा भी क्या मैं रखती हूं पोला “इज़ार बंद”॥
    आ जावे इस तरह से जो अब हर किसी के हाथ।
    वैसा तो कुछ नहीं मेरा भोला इज़ार बंद॥
    एक रात मेरे साथ वह अय्यार, मक्रबाज़।
    लेटी छुपा के अपना ममोला इज़ार बंद॥
    जब सो गई तो मैंने भी दहशत से उसकी आ।
    पहले तो चुपके चुपके टटोला इज़ार बंद॥
    आखि़र बड़ी तलाश से उस शोख़ का “नज़ीर”।
    जब आधी रात गुज़री तो खोला इज़ार बंद॥
  3. पहुंची
    क्यों न उसकी हो दिलरुवा पहुंची।
    जिसके पहुंचे पै हो किफ़ा पहुंची।
    गर पहुंच हो तो हम मलें आँखें।
    ऐसी इसकी है खु़शनुमा पहुंची।
    दिल को पहुंचे है रंज क्या-क्या वह।
    अपनी लेता है जब छिपा पहुंची।
    एक छड़ी गुल की भेजकर इसको।
    फ़िक्र थी वह न पहुंची या पहुंची।
    सुबह पूंछी रसीद जब तो “नज़ीर”।
    दी हमें शोख ने दिखा पहुंची॥
  4. आरसी
    बनवा के एक आरसी हमने कहा कि लो।
    पकड़ी कलाई उसकी जो वह शाख़सार सी।
    लेकर बड़े दिमाग और देख यक बयक।
    त्योरी चढ़ा के नाज़ में कुछ करके आरसी।
    झुंझला के दूर फेंक दी और यूं कहा चै खु़श।
    हम मारते हैं ऐसी अंगूठे पै आरसी।
    (शाख़सार=शाख़ जैसी,कोमल)
  5. आईना
    ले आईने को हाथ में, और बार बार देख।
    सूरत में अपनी कु़दरते परवरदिगार देख॥
    ख़ालेस्याह और ख़तेमुश्कबार देख।
    जुल्फ़े दराज तुर्रए अम्बर निसार देख॥
    हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
    ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥1॥

आईना क्या है? जान, तेरा पाक साफ़ दिल।
और ख़ाल क्या हैं? तेरे सुवैदा के रुख के तिल॥
जुल्फ़े दराज, फ़हमरसा से, रही हैं मिल।
लाखों तरह के फूल रहे हैं तुझी में खिल॥
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥2॥

मुश्के ततारो मुश्के ख़ुतन, भी तुझी में है।
याकू़त सुखऱ्ो लाल यमन भी तुझी में है।
नसरीनो मोतियाओ समन भी तुझी में हैं।
अलक़िस्सा क्या कहूं मैं, चमन भी तुझी में है।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥3॥

सूरजमुखी के गुल की अगर दिल में ताब है।
तू अपने मुंह को देख, कि खु़द आफ़ताब है।
गुल और गुलाब का भी तुझी में हिसाब है।
रुख़सार तेरा गुल है, पसीना गुलाब है।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥4॥

नरगिस के फूल पर, तू न अपना गुमान कर।
और सर्व से भी दिल न लगा अपना जान कर।
अपने सिवा किसी पे, न हरगिज तू ध्यान कर।
यह सब समा रहे हैं तुझी में तो आन कर।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥5॥

नरगिस वह क्या है? जान तेरी चश्मे खु़श निगाह।
और सर्व क्या है? यह तेरा क़द्देदराज़ आह।
गर सैरे बाग़ चाहे, तो अपनी ही कर तू चाह।
हक़ ने तुझी को बाग़, बनाया है वाह वाह।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥6॥

गर दिल में तेरे कु़मारियो बुलबुल का ध्यान है।
तो होंठ तेरे कु़मरी हैं, बुलबुल जुबान है।
है तू ही बाग़ और तू ही बाग़बान है।
बाग़ो चमन हैं जितने, तू उन सबकी जान है।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥7॥

बेला, गुलाब, सेवती, नसरीनौ नस्तरन।
दाऊदी, जूही, लालाओ, राबेल यासमन।
जितनी जहां में फूली हैं, फूलों की अंजुमन।
यह सब तुझी में फूल रही हैं चमन चमन।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥8॥

बाग़ो चमन के गुंचओ गुल में न हो असीर।
कु़मरी की सुन सफ़ीर, न बुलबुल की सुन सफ़ीर।
अपने तई तो देख कि क्या है? तू ऐ “नज़ीर”।
हैं हफेऱ्मन तरफ़ के यही मानी ऐ “नज़ीर”।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥9॥
(ख़ालेस्याह=काल तिल, ख़तेमुश्कबार=सुगन्धित
मुखावरण, लहज़ा=प्रत्येक क्षण, सुवैदा=काला तिल
जो हृदय पर होता है, दराज=लम्बे, फ़हमरसा=
कोयल जैसी काली, मुश्के ख़ुतन=तातार और
तिब्बत की कस्तूरी, रुख़सार=गाल, क़द्देदराज़=
लम्बा क़द, कु़मरी की सुन सफ़ीर=सीटी की
आवाज,पक्षियों की आवाज़)

  1. जुल्फ़ के फन्दे
    चहरे पै स्याह नागिन छूटी है जो लहरा कर।
    किस पेच से आई है रुख़सार पै बल खाकर॥
    जिस काकुलेमुश्कीं में फंसते हैं मलक आकर।
    उस जुल्फ़ के फन्दों ने रक्खा मुझे उलझाकर॥
    दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥1॥

जिस दिन से हुआ आकर उस जुल्फ का ज़न्दानो।
इक हो गई यह मेरी ख़ातिर की परेशानी॥
भर उम्र न जावेगी अब जी से पशेमानी।
अफ़सोस, कहूं किससे मैं अपनी यह नादानी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥2॥

जिस वक्त लिखी होवे क़िस्मत में गिरफ़्तारी।
कुछ काम नहीं आती फिर अक़्ल की हुशियारी॥
यह कै़द मेरे ऊपर ऐसी ही पड़ी भारी।
रोना मुझे आता है इस बात पै हर बारी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥3॥

उस जुल्फ़ के हबों ने लाखों के तईं मारा।
अल्लाह की ख़्वाहिश से बन्दे का नहीं चारा॥
कुछ बन नहीं आता है, ताक़त है न कुछ यारा।
अब काहे को होता है इस कै़द से छुटकारा॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥4॥

उस जुल्फ़ तलक मुझको काहे को रसाई थी।
क़िस्मत ने मेरी ख़ातिर जंजीर बनाई थी॥
तक़दीर मेरे आगे जिस दम उसे लाई थी।
शायद कि अजल मेरी बनकर वही आई थी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥5॥

गर चाहे ज़नख़दाँ में मैं डूब के दुख पाता।
यूसुफ की तरह इक दिन आखि़र में निकल आता॥
उस जुल्फ़ की ज़न्दां से कुछ पेश नहीं जाता।
आखि़र यही कह कह कर फिरता हूं मैं घबड़ाता॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥6॥

इसको तो मेरे दिल के डसने की शिताबी है।
और जिसकी वह नागिन है वह मस्त शराबी है॥
इस ग़म से लहू रोकर पुर चश्मे गुलाबी है।
क्या तुर्फ़ा मुसीबत है, क्या सख़्त ख़राबी है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥7॥

हर बन्द मेरे तन का इस कै़द में गलता है।
सर पावों से जकड़ा हूं कुछ बस नहीं चलता है॥
जी सीने में तड़पे है, अश्क आंख से ढलता है।
हर वक़्त यही मिस्रा अब मुंह से निकलता है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥8॥

इस कै़द की सख्ती में संभला हूं, न संभलूंगा।
इस काली बला से मैं जुज़ रंज के क्या लूंगा॥
इस मूज़ी के चंगुल से छूटा हूं न छूटूंगा।
आखि़र को यही कह कह इक रोज़ में जी दूंगा॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥9॥

यह कै़दे फ़रंग ऐसी दुनिया में बुरी शै है।
छूटा न असीर इसका इस कै़द की वह रै है॥
अब चश्म का साग़र है और खूने जिगर मै है।
कुछ बन नहीं आता है, कैसी फिक्र करूं ऐ है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥10॥

कहने को मेरे यारो मत दिल से भूला दीजो।
जं़जीर कोई लाकर पांवों में पिन्हा दीजो॥
मर जाऊं तो फिर मेरा आसार बना दीजो।
मरक़द पै यही मिस्रा तुम मेरे खुदा दीजो॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥11॥

उस जुल्फ़ के फंदे में यों कौन अटकता है।
ज्यों चोर किसी जागह रस्से में लटकता है॥
कांटे की तरह दिल में ग़म आके खटकता है।
यह कहके “नज़ीर” अपना सर ग़म से पटकता है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥12॥
(काकुलेमुश्कीं=कस्तूरी केश, मलक=फरिश्ते,देवता,
ज़न्दानो=कै़दी, पशेमानी=लज्जा,पछतावा, हबों=साँग,
हथियार, ज़नख़दाँ=ठोड़ी का गड्ढा, आसार=निशान,
मरक़द=कब्र)

  1. परी का सरापा
    खूंरेज़करिश्मा, नाज़ो सितम, गम़जों की झुकावट वैसी ही।
    मिज़गाँ की सनां, नज़रों की अनी अबरू की खिंचावट वैसी ही॥
    क़त्ताल निगाह और दिष्ट ग़जब आंखों की लगावट वैसी ही।
    पलकों की झपक, पुतली की फिरत, सुर्मे की लगावट वैसी ही॥
    अय्यार नज़र, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही॥1॥

बेदर्द, सितमगर, बेपरवा, बेकल, चंचल, चटकीली सी।
दिल सख़्त क़यामत पत्थर सा और बातें नर्म रसीली सी॥
आनों की बान हटीली सी, काजल की आंख कटीली सी।
वह अंखियां मस्त नशीली सी कुछ काली सी कुछ पीली सी॥
चितवन की दग़ा, नज़रों की कपट, सैनों की लड़ावट वैसी ही॥2॥

थी खूब अदा से सर ऊपर संजाफ दुपट्टे की उल्टी।
बलदार लटें, तस्वीर जबीं जकड़ी मेंढ़ी, नीची कंघी॥
दिल लोट न जावे अब क्योंकर, और देख न उलझे कैसे जी।
वह रात अंधेरी बालों की, वह मांग चमकती बिजली सी॥
जुल्फों की खुलत, पट्टी की जमत, चोटी की गुंधावट वैसी ही॥3॥

उस काफ़िर बीनी और नथ के अन्दाज़ क़यामत शान भरे।
और गहरे चाहे ज़नखन्दाँ में, सौ आफ़त के तूफान भरे॥
वह नर्मो साफ़ सितारा से और मोती से दामान भरे।
वह कान जवाहरकान भरे कन फूलों, बाले जान भरे॥
बुन्दों की लटक, झुमकों की झमक, बाले की हिलावट वैसी ही॥5॥

चेहरे पर हुस्न की गर्मी से हर आन झमकते मोती से।
ख़ुशरंग पसीने की बूंदें, सौ बार झमकते मोती से॥
हँसने की अदा में फूल झड़ें, बातों में टपकते मोती से।
वह पतले पतले होंठ ग़जब वह दांत चमकते मोती से॥
पानों की रंगावट क़हर सितम, धड़ियों की जमावट वैसी ही॥5॥

उस सीने का वह चाक सितम, उस कुर्ती का तनजे़ब ग़जब।
उस क़द की ज़ीनत क़हर बला उस काफ़िर छवि का ज़ेब ग़जब॥
उन डिबियों का आज़ार बुरा, उन गेंदों का आसेब ग़जब।
वह छोटी छोटी सख़्त कुचें, वह कच्चे कच्चे सेब ग़जब॥
अंगिया की भड़क, गोटों की झमक, बुन्दों की कसावट वैसी ही॥6॥

थी पहने दोनों हाथों में काफ़िर जो कड़े गंगा जमुनी।
कुछ शोख़ कड़ों की झनकारें, कुछ झनके चूड़ी बाहों की॥
यह देख के आलम आशिक़ का सीने में न तड़पे क्यूं कर जी।
वह पतली पतली अंगुश्तें, पोरें वह नाजुक नाजुक सी॥
मेंहदी की रँगत, फ़न्दक की बनत, छल्लों की छलावट वैसी ही॥7॥

तक़रीर बयां से बाहर है, वह काफ़िर हुस्न, अहा! हा! हा!।
कुछ आप नई कुछ हुस्न नया, कुछ जोश जवानी उठती का॥
लपकें, झपकें उन बाहों की यारों मैं आह! कहूं क्या-क्या।
वह बांके बाजू होशरुबा आशिक़ से खेले बांक पटा॥
पहुंची की पहुंच, पहुंचे पै ग़जब, बांकों की बंधावट वैसी ही॥8॥

वह काफ़िर धज, जी देख जिसे सौ बार क़यामत का लरजे।
पाजेब,कड़े, पायल, घुंघरू, कड़ियां, छड़ियां, गजरे, तोड़े॥
हर जुम्बिश में सौ झंकारें, हर एक क़दम पर सौ झमके।
वह चंचल चाल जवानी की, ऊंची एड़ी नीचे पंजे॥
कफ़्शों की खटक, दामन की झटक, ठोकर की लगावट वैसी ही॥9॥

एक शोरे क़यामत साथ चले, निकले काफ़िर जिस दम बन ठन।
बलदार कमर रफ़्तार ग़जब, दिल की क़ातिल जी की दुश्मन॥
मज़कूर करूं मैं अब यारों उस शोख के क्या क्या चंचलपन।
कुछ हाथ हिलें कुछ पांव हिलें, फड़कें बाजू थिरके सब तन॥
गाली वह बला, ताली वह सितम, उंगली की नचावट वैसी ही॥10॥

यह होश क़यामत काफ़िर का, जो बात कहो वह सब समझे।
रूठे, मचले, सौ स्वांग करे, बातों में लड़े, नज़रों से मिले॥
यह शोख़ी फुर्ती बेताबी एक आन कभी निचली न रहे।
चंचल अचपल मटके चटके, सर खोले ढांके हँस-हँस के॥
कहकह की हंसावट और ग़ज़ब, ठट्ठों की उड़ावट वैसी ही॥11॥

कोहनी मारे, चुटकी लेले छेड़े, झिड़के, देवे गाली।
हर आन ‘चे खु़श’ हर दम ‘अच्छा’, हर बात खु़शी की चुहल भरी॥
नज़रों में साफ़ उड़ाले दिल, इस ढब की काफ़िर अय्यारी।
और हट जावे सौ कोस परे, गर बात कहो कुछ मतलब की॥
रम्ज़ो के ज़िले, गम्जों की जुगत, ठट्ठो की उड़ावट वैसी ही॥12॥

कातिल हर आन नये आलम, काफ़िर हर आन नई झमकें।
बाँकी नज़रें तिरछी, पलकें, भोली सूरत, मीठी बातें॥
दिल बस करने के लाखों ढब, जी लेने की सौ सौ घातें।
हर वक़्त फ़बन, हर आन सजन, दम दम में बदले लाख धजें॥
बाहों की झमक, घूंघट की अदा, जोबन की दिखावट वैसी ही॥13॥

जो उस पर हुस्न का आलम है, वह आलम हूर कहां पावे।
गर पर्दा मुंह से दूर करे, खुर्शीद को चक्कर आ जावे॥
जब ऐसा हुस्न भभूका हो, दिल ताब भला क्यूंकर लावे।
वह मुखड़ा चांद का टुकड़ा, सा जो, देख परी को गश आवे॥
गालों की दमक, चोटी की झमक रंगों की खिलावट वैसी ही॥14॥

तस्वीर का आलम नख सिख से छब तख्ती साफ़ परी की सी।
कुछ चीने जबीं पर ऐंठ रही और होंठों में कुछ गाली सी॥
बेदर्दी सख़्ती बहुतेरी; और मेहरों मुहब्बत थोड़ी सी।
झूठी अय्यारी नाक चढ़ी, भोली भाली पक्की बीसी॥
बातों की लगावट क़हर सितम, नज़रों की मिलावट वैसी ही॥15॥

कुछ नाज़ो अदा कुछ मग़रूरी, कुछ शर्मो हया कुछ बांकपना।
कुछ आमद हुस्न के मौसम की, कुछ काफिरजिस्म रहा गदरा॥
कुछ शोर जवानी उठती का चढ़ता है घमंड कर जूं दरिया।
वह सीना उभरा जोश भरा, वह आलम जिसका झूम रहा॥
शानो की अकड़, जोबन की तकड़, सज धज की सजावट वैसी ही॥16॥

यह काफिर गुद्दी का आलम घबराये परी भी देख जिसे।
वह गोरा साफ गला ऐसा, वह जावे मोती देख जिसे॥
दिल लोटे तड़पे हाथ मले, और ग़श खावे जी देख जिसे।
वह गर्दन ऊंची हुस्न भरी, कट जाय सुराही देख जिसे॥
दायें की मुड़त बायें की फिरत, मोढ़ों की खिंचावट वैसी ही॥17॥

इस गोरे नाजुक सीने पर वह गहने के गुलज़ार खिले।
चंपे की कली, हीरे की जड़ी तोड़े जुगनू हैकल बद्धी॥
दिल लोटे तड़पे हाथ मले और जाय नज़र हर दम फिसली।
वह पेट मलाई सा काफ़िर वह नाफ़ चमकती तारा सी॥
शोख़ी की खुलावट और सितम शर्मो की छिपावट वैसी ही॥18॥

हर आन निराली हर इक से उस शोख़ परी की महबूबी।
कुछ नाज़ो अदा की मरगूबी कुछ शर्मो हया की महबूबी॥
अब गहने की तारीफ करूँ या काफ़िर जोड़े की खूबी।
पोशाक सुनहरी इत्र भरी सर पाँव जवाहर में डूबी॥
जुगनू की दमक, हीना की सफा, कुर्ती की फँसावट वैसी ही॥19॥

जब ऐसा हुस्न का दरिया हो किस तौर न लहरों में बहिए।
गर मेहरो मुहब्बत हो भीतर और जोरो जफ़ा हो तो सहिए॥
दिल लोट गया है ग़श खाकर बस और तो आगे क्या कहिए।
मिल जाय “नज़ीर” ऐसी जो परी छाती से लिपट कर सो रहिए॥
बोसों की चपक, बग़लों की लपक, सीनों की मिलावट वैसी ही॥20॥
(खूंरेज़करिश्मा,=खून बरसाने वाला चमत्कार, गम़जों=हावभाव,
मिज़गाँ=पलक, सनां=बरछी, अनी=नोंक, अबरू=भोंह, क़त्ताल=
कत्ल करने वाली, जबीं=माथा, बीनी=नाक, ज़नखन्दाँ=ठोड़ी का
गड्ढा, ज़ीनत=सौन्दर्य, आसेब=ख़तरा,भूत-बाधा, फ़न्दक=मेंहदी
से रंगे उंगलियों के सिरे, होशरुबा=होश उड़ाने वाले, कफ़्शों=
पादुका,जूती, मज़कूर=वर्णन, रम्ज़=संकेत, ज़िले=छाया,परछाई,
शानो=माथे का बल जो अप्रसन्नता का चिह्न है, हैकल=गले
की माला, मरगूबी=रुचिकर,आकर्षण)