Bhagavad Geeta Chapter 18 in hindi

Moksh Sanyas Yog chapter 18

मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते৷৷18.26৷৷muktasaṅgō.nahaṅvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ.siddhyasiddhyōrnirvikāraḥ kartā sāttvika ucyatē৷৷18.26৷৷भावार्थ : जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है ৷৷18.26॥


रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः৷৷18.27৷৷rāgī karmaphalaprēpsurlubdhō hiṅsātmakō.śuciḥ.harṣaśōkānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ৷৷18.27৷৷भावार्थ : जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है ৷৷18.27॥


आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः ।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते৷৷18.28৷৷ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭhō naiṣkṛtikō.lasaḥ.viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyatē৷৷18.28৷৷भावार्थ : जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। ) है वह तामस कहा जाता है ৷৷18.28॥

Advertisements

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ৷৷18.29৷৷buddhērbhēdaṅ dhṛtēścaiva guṇatastrividhaṅ śrṛṇu.prōcyamānamaśēṣēṇa pṛthaktvēna dhanañjaya৷৷18.29৷৷भावार्थ : हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन ৷৷18.29॥


प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ৷৷18.30৷৷pravṛttiṅ ca nivṛttiṅ ca kāryākāryē bhayābhayē.bandhaṅ mōkṣaṅ ca yā vētti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī৷৷18.30৷৷भावार्थ : हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए राजा जनक की भाँति बरतने का नाम ‘प्रवृत्तिमार्ग’ है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए श्री शुकदेवजी और सनकादिकों की भाँति संसार से उपराम होकर विचरने का नाम ‘निवृत्तिमार्ग’ है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है ৷৷18.30॥


यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी৷৷18.31৷৷yayā dharmamadharmaṅ ca kāryaṅ cākāryamēva ca.ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī৷৷18.31৷৷भावार्थ : हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है ৷৷18.31॥


अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी৷৷18.32৷৷adharmaṅ dharmamiti yā manyatē tamasā৷৷vṛtā.sarvārthānviparītāṅśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī৷৷18.32৷৷भावार्थ : हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी ‘यह धर्म है’ ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है ৷৷18.32॥


धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ৷৷18.33৷৷dhṛtyā yayā dhārayatē manaḥprāṇēndriyakriyāḥ.yōgēnāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī৷৷18.33৷৷भावार्थ : हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह ‘अव्यभिचारिणी धारणा’ है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम ‘उनकी क्रियाओं को धारण करना’ है।) को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है ৷৷18.33॥


यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी৷৷18.34৷৷yayā tu dharmakāmārthān dhṛtyā dhārayatē.rjuna.prasaṅgēna phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī৷৷18.34৷৷भावार्थ : परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है ৷৷18.34॥


यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी৷৷18.35৷৷yayā svapnaṅ bhayaṅ śōkaṅ viṣādaṅ madamēva ca.na vimuñcati durmēdhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī৷৷18.35৷৷भावार्थ : हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है ৷৷18.35॥


सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति৷৷18.36৷৷यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌৷৷

18.37৷৷sukhaṅ tvidānīṅ trividhaṅ śrṛṇu mē bharatarṣabha.abhyāsādramatē yatra duḥkhāntaṅ ca nigacchati৷৷18.36৷৷yattadagrē viṣamiva pariṇāmē.mṛtōpamam.tatsukhaṅ sāttvikaṅ prōktamātmabuddhiprasādajam৷৷18.37৷৷

भावार्थ : हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम ‘विष के तुल्य प्रतीत होता’ है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है ৷৷18.36-37॥


विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌৷৷18.38৷৷viṣayēndriyasaṅyōgādyattadagrē.mṛtōpamam.pariṇāmē viṣamiva tatsukhaṅ rājasaṅ smṛtam৷৷18.38৷৷भावार्थ : जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को ‘परिणाम में विष के तुल्य’ कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है ৷৷18.38॥


यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌৷৷18.39৷৷yadagrē cānubandhē ca sukhaṅ mōhanamātmanaḥ.nidrālasyapramādōtthaṅ tattāmasamudāhṛtam৷৷18.39৷৷भावार्थ : जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है ৷৷18.39॥


न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः৷৷18.40৷৷na tadasti pṛthivyāṅ vā divi dēvēṣu vā punaḥ.sattvaṅ prakṛtijairmuktaṅ yadēbhiḥ syātitrabhirguṇaiḥ৷৷18.40৷৷भावार्थ : पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो ৷৷18.40॥


ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः৷৷18.41৷৷brāhmaṇakṣatriyaviśāṅ śūdrāṇāṅ ca paraṅtapa.karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ৷৷18.41৷৷भावार्थ : हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ৷৷18.41॥


शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ৷৷18.42৷৷śamō damastapaḥ śaucaṅ kṣāntirārjavamēva ca.jñānaṅ vijñānamāstikyaṅ brahmakarma svabhāvajam৷৷18.42৷৷भावार्थ : अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ৷৷18.42॥


शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌৷৷18.43৷৷śauryaṅ tējō dhṛtirdākṣyaṅ yuddhē cāpyapalāyanam.dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṅ karma svabhāvajam৷৷18.43৷৷भावार्थ : शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ৷৷18.43॥


कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌৷৷18.44৷৷kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṅ vaiśyakarma svabhāvajam.paricaryātmakaṅ karma śūdrasyāpi svabhāvajam৷৷18.44৷৷भावार्थ : खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम ‘सत्य व्यवहार’ है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ৷৷18.44॥


स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु৷৷18.45৷৷svē svē karmaṇyabhirataḥ saṅsiddhiṅ labhatē naraḥ.svakarmanirataḥ siddhiṅ yathā vindati tacchṛṇu৷৷18.45৷৷भावार्थ : अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन ৷৷18.45॥


यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः৷৷18.46৷৷yataḥ pravṛttirbhūtānāṅ yēna sarvamidaṅ tatam.svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṅ vindati mānavaḥ৷৷18.46৷৷भावार्थ : जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है (जैसे बर्फ जल से व्याप्त है, वैसे ही संपूर्ण संसार सच्चिदानंदघन परमात्मा से व्याप्त है), उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके (जैसे पतिव्रता स्त्री पति को सर्वस्व समझकर पति का चिंतन करती हुई पति के आज्ञानुसार पति के ही लिए मन, वाणी, शरीर से कर्म करती है, वैसे ही परमेश्वर को ही सर्वस्व समझकर परमेश्वर का चिंतन करते हुए परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मन, वाणी और शरीर से परमेश्वर के ही लिए स्वाभाविक कर्तव्य कर्म का आचरण करना ‘कर्म द्वारा परमेश्वर को पूजना’ है) मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है ৷৷18.46॥


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌৷৷18.47৷৷śrēyānsvadharmō viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt.svabhāvaniyataṅ karma kurvannāpnōti kilbiṣam৷৷18.47৷৷भावार्थ : अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता ৷৷18.47॥


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः৷৷18.48৷৷sahajaṅ karma kauntēya sadōṣamapi na tyajēt.sarvārambhā hi dōṣēṇa dhūmēnāgnirivāvṛtāḥ৷৷18.48৷৷भावार्थ : अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म (प्रकृति के अनुसार शास्त्र विधि से नियत किए हुए वर्णाश्रम के धर्म और सामान्य धर्मरूप स्वाभाविक कर्म हैं उनको ही यहाँ स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, स्वभावनियत कर्म इत्यादि नामों से कहा है) को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं ৷৷18.48॥


असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति৷৷18.49৷৷asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ.naiṣkarmyasiddhiṅ paramāṅ saṅnyāsēnādhigacchati৷৷18.49৷৷भावार्थ : सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है ৷৷18.49॥