Lijjat papad motivational story in hindi – लिज्जत पापड़ की अद्भुत कहानी

लिज्जत पापड़ की प्रेरणा दायक कहानी -Inspirational story

मात्र 80 रूपये से शुरू होकर Rs 800 करोड़ से अधिक की बिक्री की लिज्जत पापड़ की कहानी

हमारे समाज में औरतों को अक्सर पुरुषों से कम ही आंका जाता है लेकिन कई सफल महिलाओं ने इस बात को पूरी तरह गलत साबित किया है। हम सभी ने रानी लक्ष्मी बाई ,एनी बसंत,मदर टेरेसा का नाम सुना है। लेकिन आज हम जिन महिलाओं की बात कर रहे हैं उन्‍होंने घर से शुरु हुए पापड़ के छोटे से कारोबार को अपनी काबिलियत से सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया।

गांव की पृष्ठभूमि से आई और कम पढ़ी-लिखी होने बावजूद अपनी मेहनत से इन्‍होंने वह कर दिखाया जिसे करना आसान नहीं था। भारतीय महिलाओं के लिये ये काफी सम्मान की बात है और ये हौसला भी देती है कि अगर आप अपने हुनर को तलाश लें तो कामयाबी पा सकती हैं। आज हम आपको बताने वाले हैं पापड़ का पर्याय बने श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ के बारे में। जिस दिन लिज्जत का पहला पापड़ बेला गया था, उस दिन शायद किसी ने ये सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन यह एक बड़ा उद्योग बनेगा और हजारों महिलाओं के रोजी-रोटी का सहारा भी बनेगा।

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अच्छी क्वालिटी एवं बढ़िया स्वाद के लिए जाने जानेवाले लिज्जत पापड़ की सफलता की कहानी अद्भुत है। यह कहानी निश्चित रूप से सहकारी क्षेत्र में सफलता की शानदार मिसाल है। मात्र 80 रु में केवल 7 महिलाओं द्वारा वर्ष 1959 में शुरू किए गए महिला गृह उद्योग ने आज 800 करोड़ से अधिक की बिक्री का आँकड़ा पार कर रहा है।
आज इस संस्थान से 42000 से अधिक महिलाएँ जुड़ी हुई हैं। , बन्द पड़ी पापड़ बनाने की इकाई को खरीदकर 15 मार्च, 1959 को पापड़ बनाने का कार्य शुरू किया।

4 पैकेट पापड़ बनाने से इस उद्योग की मुम्बई में शुरूआत हुई। धीरे-धीरे यह को-ऑपरेटिव में परिवर्तित हो गया और आज एक बड़े उद्योग के रूप में इसे जाना जाता है। इसकी पहले वर्ष की बिक्री मात्र 6196 रु थी। आज इसकी बिक्री 800 करोड़ से भी अधिक है।

कहां से शुरू हुई यह संघर्ष की कहानी:

मुंबई की रहने वाली जसवंती जमनादास पोपट ने अपना परिवार चलाने के लिए 1959 में पापड़ बेलने का काम शुरू किया था। जसवंती बेन गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी और कम पढ़ी-लिखी भी थी लेकिन उनमें कारोबार की अच्‍छी समझ थी। उन्होंने इस काम में अपने साथ और छह गरीब बेरोजगार महिलाओं को जोड़ा और 80 रुपये का कर्ज लिया और पापड़ बेलने का काम शुरु किया।

उनके साथ शामिल हुईं महिलाओं के नाम थे उजमबेन नरानदास कुण्डलिया, पार्वतीबेन रामदास ठोदानी, लागुबेन अमृतलाल गोकानी, बानुबेन तन्ना, जयाबेन विठलानी और उनके साथ एक और महिला थी, जिसे पापड़ों को बेचने की जिम्मेदारी ली थी। यह सभी महिलाएं गुजराती परिवार से थीं, तो जाहिर सी बात है कि उन्हें पापड़-खाखरा बनाने में महारत हासिल थीं।

इन महिलाओं द्वारा 15 मार्च 1959 को लिज्जत का पहला पापड़ बेला गया था। पापड़ बेलने की शुरूआत किसी बड़े उद्योग या फिर पैसे कमाने के उद्देश्य से नहीं हुई थी।

सातों ने तय किया था कि वे इस व्यवसाय के लिए किसी से चंदा नही मांगेगी, भले उनका व्यवसाय घाटे में ही क्यों ना चला जाये। लेकिन कुछ महीने की मेहनत में ही उन्होंने 80 रुपए का उधार चुका दिया और फिर चार पैकेट से 40 और फिर 400 तक पहुंचने में समय नहीं लगा। 80 रुपये से शुरू हुआ यह कारोबार आज सालाना 800 करोड़ रुपये का कारोबार करती है। इस कारोबार से तकरीबन 45 हजार महिलाएं जुड़ी हुई हैं और इसके 62 ब्रांच हैं।

ये सभी महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर थी और अपनी खराब आर्थिक स्थिति के कारण ज्‍यादा शिक्षा प्राप्‍त नहीं कर पाई हुई थी । लेकिन वो इसे अपनी कमी नहीं मानती थी और यही इस कारोबार की सफलता का राज है। 1962 में ग्रुप ने अपने पापड़ का नामकरण किया और यह नाम था ‘लिज्जत पापड़’। लिज्जत गुजराती शब्द है, जिसका अर्थ स्वादिष्ट होता है। साथ ही, इस ऑर्गेनाइजेशन का नाम रखा गया ‘श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़’।

यह कहानी महिलाओं के सशक्तीकरण एवं उनकी मेहनत से उपजी अभूतपूर्व सफलता की कहानी है। आज लिज्जत पापड़ न केवल हमारे देश के घर-घर में प्रयुक्त होता है, बल्कि इसका निर्यात भी किया जा रहा है।

इस संस्थान का कोई एक मालिक नहीं है, बल्कि संस्थान से जुड़ी हर महिला इसकी स्वामिनी है, लाभ एवं हानि बराबर से सभी द्वारा साझा किए जाते हैं।

इस संस्थान में न दान लिया जाता है, न ही किसी तरह का भी दान स्वीकार किया जाता है। संस्थान में निर्णय थोपा नहीं जाता, बल्कि सभी के द्वारा सर्वसम्मति से लिया जाता है। महिला गृह उद्योग-लिज्जत पापड़, एक अनूठा संस्थान है, जिसकी सफलता की कहानी भी अद्भुत है।