Irshad kamil Shayari | कामिल की शायरी

इरशाद कामिल की शायरी

होगा यूँ ही

मैं तुम्हें एक ख़त लिखूँगा
मगर उसे डाक में नहीं डालूँगा
मैं बनाऊँगा उस की एक नाव
जिस पे सवार कर के अपनी सोच

ठेल दूँगा बरसात के पानी में
तुम्हारी ओर
तुम भी एक ख़त लिखना

Advertisements

जवाबी
मगर उसे डाक में मत डाल देना
नाव पहुँचने से पहले ही
जब डूब जाएगी
तुम तक नहीं पहुँच पाएगी

मेरी सोच
तुम झुझलाना मुझ पर
और ग़ुस्से में आ कर
फाड़ देना उस ख़त को
जो तुम ने अभी नहीं लिखा

Irshad kamil Shayari on farm bill

बुज़ुर्गों के, किसानों के शहर की सब दुकानों के सभी मासूम बच्चों के बचपन के ज़मानों के किया है नाम मैंने वो जो क़ीमत में मामूली है नई सुब्हा नई उम्मीद का ये ख़ुशनुमा पैग़ाम…

अपने खिलाफ अपना ही किरदार मत बना
मैं पुल बना रहा हूं तू दीवार मत बना

हमसे जाने क्यूँ बेवजह
जलते हैं फासले
मिलना तेरा गले पर
मिल रहे ये गले
आजा मिटा, ये जो है फासला तेरा मेरा
खाली है जो तेरे बिना
मैं वो घर हूँ तेरा

किसी मोड़ पे वो आज भी, कंदील सी जलेगी
शहर की धूप सी बेवक़्त ही ढलेगी।

बातें लिये मैं रूह की चौखट पे खड़ा हूँ,
तू जिस्म के मकान से बाहर नहीं आता.

छोड़े ना छूटे कभी, तोड़े ना टूटे कभी जो धागा तुमसे जुड़ गया, वफ़ा का”

सामने आ खोल दे सब, जो है दिल में बोल दे अब।

Mohabbat Roshni Hai Roshni Sab Ki Zaroorat Hai, Andhere Par likhi Ummeed Ki Umda Ibarat Hai, DIWALI Naam Hai Apne Hi Ghar Ko Laut Aane Ka, Mubarak Lautna Hai Jab talak Har Ghar Salaamat Hai.

.Tum sath ho yaaa na ho kyaaa fark hai…. Bedard thi zindagi bedard hai… 2.Agar tum saath ho Dil ye sambhal jaaye.. Agar tum saath ho Har gham phisal jaaye..

¶¶ वो इस वहम में जिये कि नहीं किसी की वो मैं इस यक़ीं पे मरूँ मैं सिर्फ़ उसी का हूँ • वो अपने आप में सिमटे ज़मीन हो जाये वो अपने वहम से उठकर यक़ीन हो जाये • मैं उसके हुस्न पे लिक्खा दिवान हो जाऊँ ज़हन की कैद से छूटूँ जहान हो जाऊँ •