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Harivansh Rai Bachchan Poems | हरिवंश राय बच्चन कविता संग्रह

Harivansh Rai Bachchan Poems |कोई पार नदी के गाता | हरिवंश राय बच्चन Harivansh Rai Bachchan

 कोई पार नदी के गाता!
भंग निशा की नीरवता कर,इस देहाती गाने का स्वर,ककड़ी के खेतों से उठकर,आता जमुना पर लहराता!कोई पार नदी के गाता!
होंगे भाई-बंधु निकट ही,कभी सोचते होंगे यह भी,इस तट पर भी बैठा कोईउसकी तानों से सुख पाता!कोई पार नदी के गाता!
आज न जाने क्यों होता मनसुनकर यह एकाकी गायन,सदा इसे मैं सुनता रहता,सदा इसे यह गाता जाता!कोई पार नदी के गाता!

Yah Meeti ki Chaturai Harivansh Rai Bachchan poem

यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो !

Tum apne rang me rango toh holi hai Harivansh Rai Bachchan poem

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

खेल चुके हम फाग समय से!

फैलाकर निःसीम भुजाएँ,
अंक भरीं हमने विपदाएँ,
होली ही हम रहे मनाते प्रतिदिन अपने यौवन वय से!
खेल चुके हम फाग समय से!

मन दे दाग अमिट बतलाते,
हम थे कैसा रंग बहाते
मलते थे रोली मस्तक पर क्षार उठाकर दग्ध हृदय से!
खेल चुके हम फाग समय से!

रंग छुड़ाना, चंग बजाना,
रोली मलना, होली गाना–
आज हमें यह सब लगते हैं केवल बच्चों के अभिनय से!
खेल चुके हम फाग समय से!

Agneepath Apgneepath Harivansh Rai Bachchan Poems |

अग्निपथ / हरिवंश राय बच्चन 

 वृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,एक पत्र छाँह भी,माँग मत, माँग मत, माँग मत,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
तू न थकेगा कभी,तू न रुकेगा कभी,तू न मुड़ेगा कभी,कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,चल रहा मनुष्य है,अश्रु श्वेत रक्त से,लथपथ लथपथ लथपथ,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

Kya hai meri baari |Harivansh Rai Bachchan Poems

क्या है मेरी बारी में / हरिवंशराय बच्चन

 क्या है मेरी बारी में।
जिसे सींचना था मधुजल सेसींचा खारे पानी से,नहीं उपजता कुछ भी ऐसीविधि से जीवन-क्यारी में।क्या है मेरी बारी में।
आंसू-जल से सींच-सींचकरबेलि विवश हो बोता हूं,स्रष्टा का क्या अर्थ छिपा हैमेरी इस लाचारी में।क्या है मेरी बारी में।
टूट पडे मधुऋतु मधुवन मेंकल ही तो क्या मेरा है,जीवन बीत गया सब मेराजीने की तैयारी में|क्या है मेरी बारी में

Harivansh Rai Bachchan Poems |Lo Din Bita Lo Raat Gayi

लो दिन बीता लो रात गयी / हरिवंशराय बच्चन 

 सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,डूबा, संध्या आई, छाई,सौ संध्या सी वह संध्या थी,क्यों उठते-उठते सोचा थादिन में होगी कुछ बात नईलो दिन बीता, लो रात गई
धीमे-धीमे तारे निकले,धीरे-धीरे नभ में फ़ैले,सौ रजनी सी वह रजनी थी,क्यों संध्या को यह सोचा था,निशि में होगी कुछ बात नई,लो दिन बीता, लो रात गई
चिडियाँ चहकी, कलियाँ महकी,पूरब से फ़िर सूरज निकला,जैसे होती थी, सुबह हुई,क्यों सोते-सोते सोचा था,होगी प्रात: कुछ बात नई,लो दिन बीता, लो रात गई

Harivansh Rai Bachchan Poems | Khasn bhar ko pyaar kiya tha

क्षण भर को क्यों प्यार किया था? हरिवंशराय बच्चन 

 क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,पलक संपुटों में मदिरा भरतुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
‘यह अधिकार कहाँ से लाया?’और न कुछ मैं कहने पाया -मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
वह क्षण अमर हुआ जीवन में,आज राग जो उठता मन में -यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

Harivansh Rai Bachchan Poems |Aise mai man

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ / हरिवंशराय बच्चन

 सोचा करता बैठ अकेले,गत जीवन के सुख-दुख झेले,दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,होकर अपने प्रति अति निर्मम,उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,मानव की ही तो छाती है,लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

Harivansh Rai Bachchan Poems | Aa rahi ravi ki sawari

हरिवंशराय बच्‍चन | आ रही रवि की सवारी!

नव किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी!
आ रही रवि की सवारी!

विहग बंदी और चारण,
गा रहे हैं कीर्ति गायन,
छोड़कर मैदान भागी तारकों की फौज सारी!
आ रही रवि की सवारी!

चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह,
रात का राजा खड़ा है राह में बनकर भिखारी!
आ रही रवि की सवारी

Dekho Tut raha hai Tara by Harivansh Rai Bachchan Poems

हरिवंशराय बच्‍चन | देखो, टूट रहा है तारा

नभ के सीमाहीन पटल पर
एक चमकती रेखा चलकर
लुप्त शून्य में होती-बुझता एक निशा का दीप दुलारा!
देखो, टूट रहा है तारा!

हुआ न उडुगन में क्रंदन भी,
गिरे न आँसू के दो कण भी
किसके उर में आह उठेगी होगा जब लघु अंत हमारा!
देखो, टूट रहा है तारा!

यह परवशता या निर्ममता
निर्बलता या बल की क्षमता
मिटता एक, देखता रहता दूर खड़ा तारक-दल सारा!
देखो, टूट रहा है तारा!

Atma Parichay by Harivansh Rai Bachchan Poems |

आत्‍मपरिचय / हरिवंशराय बच्‍चन 

 मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!

मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;
जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,
उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!

कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

Harivansh Rai Bachchan Poems | मैं कल रात नहीं रोया था / हरिवंशराय बच्चन

 मैं कल रात नहीं रोया था
दुख सब जीवन के विस्मृत कर,तेरे वक्षस्थल पर सिर धर,तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था!मैं कल रात नहीं रोया था!
प्यार-भरे उपवन में घूमा,फल खाए, फूलों को चूमा,कल दुर्दिन का भार न अपने पंखो पर मैंने ढोया था!मैं कल रात नहीं रोया था!
आँसू के दाने बरसाकरकिन आँखो ने तेरे उर परऐसे सपनों के मधुवन का मधुमय बीज, बता, बोया था?मैं कल रात नहीं रोया था!

Harivansh Rai Bachchan Poems | त्राहि त्राहि कर उठता जीवन / हरिवंशराय बच्चन 

 त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
जब रजनी के सूने क्षण में,तन-मन के एकाकीपन मेंकवि अपनी विव्हल वाणी से अपना व्याकुल मन बहलाता,त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
जब उर की पीडा से रोकर,फिर कुछ सोच समझ चुप होकरविरही अपने ही हाथों से अपने आंसू पोंछ हटाता,त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!
पंथी चलते-चलते थक कर,बैठ किसी पथ के पत्थर परजब अपने ही थकित करों से अपना विथकित पांव दबाता,त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन!

Harivansh Rai Bachchan Poems | इतने मत उन्‍मत्‍त बनो / हरिवंशराय बच्चन Harivansh Rai Bachchan

 इतने मत उन्‍मत्‍त बनो!
जीवन मधुशाला से मधु पी
बनकर तन-मन-मतवाला,
गीत सुनाने लगा झुमकर
चुम-चुमकर मैं प्‍याला-
शीश हिलाकर दुनिया बोली,
पृथ्‍वी पर हो चुका बहुत यह,
इतने मत उन्‍मत्‍त बनो।

इतने मत संतप्‍त बनो।
जीवन मरघट पर अपने सब
आमानों की कर होली,
चला राह में रोदन करता
चिता-राख से भर झोली-
शीश हिलाकर दुनिया बोली,
पृथ्‍वी पर हो चुका बहुत यह,
इतने मत संतप्‍त बनो।

इतने मत उत्‍तप्‍त बनो।
मेरे प्रति अन्‍याय हुआ है
ज्ञात हुआ मुझको जिस क्षण,
करने लगा अग्नि-आनन हो
गुरू-गर्जन, गुरूतर गर्जन-
शीश हिलाकर दुनिया बोली,
पृथ्‍वी पर हो चुका बहुत यह,
इतने मत उत्‍तप्‍त बनो।

Harivansh Rai Bachchan Poems | स्वप्न था मेरा भयंकर

स्वप्न था मेरा भयंकर!
रात का-सा था अंधेरा,बादलों का था न डेरा,किन्तु फिर भी चन्द्र-तारों से हुआ था हीन अम्बर!स्वप्न था मेरा भयंकर!
क्षीण सरिता बह रही थी,कूल से यह कह रही थी-शीघ्र ही मैं सूखने को, भेंट ले मुझको हृदय भर!स्वप्न था मेरा भयंकर!
धार से कुछ फासले परसिर कफ़न की ओढ चादरएक मुर्दा गा रहा था बैठकर जलती चिता पर!स्वप्न था मेरा भयंकर!

Harivansh Rai Bachchan Poems | तुम तूफान समझ पाओगे

 गीले बादल, पीले रजकण,सूखे पत्ते, रूखे तृण घनलेकर चलता करता ‘हरहर’–इसका गान समझ पाओगे?तुम तूफान समझ पाओगे?
गंध-भरा यह मंद पवन था,लहराता इससे मधुवन था,सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?तुम तूफान समझ पाओगे?
तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,जाता है अज्ञात दिशा को! हटो विहंगम, उड़ जाओगे!तुम तूफान समझ पाओगे?

Harivansh Rai Bachchan Poems | रात आधी खींच कर मेरी हथेली

 रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों मेंऔर चारों ओर दुनिया सो रही थी,तारिकाएँ ही गगन की जानती हैंजो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,रात आधी खींच कर मेरी हथेलीरात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं,कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसूबह रहे थे इस नयन से उस नयन में,
मैं लगा दूँ आग इस संसार में हैप्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर,जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रनेके लिए था कर दिया तैयार तुमने!रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
प्रात ही की ओर को है रात चलतीऔ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी,खूबियों के साथ परदे को उठाता,
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था,और मैंने था उतारा एक चेहरा,वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने परग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
और उतने फ़ासले पर आज तक सौयत्न करके भी न आये फिर कभी हम,फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौकाउस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ,क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं–बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जोरख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

Harivansh Rai Bachchan Poems | साथी, साँझ लगी अब होने! / हरिवंशराय बच्चन

 फैलाया था जिन्हें गगन में,विस्तृत वसुधा के कण-कण में,उन किरणों के अस्ताचल पर पहुँच लगा है सूर्य सँजोने!साथी, साँझ लगी अब होने!
खेल रही थी धूलि कणों में,लोट-लिपट गृह-तरु-चरणों में,वह छाया, देखो जाती है प्राची में अपने को खोने!साथी, साँझ लगी अब होने!
मिट्टी से था जिन्हें बनाया,फूलों से था जिन्हें सजाया,खेल-घरौंदे छोड़ पथों पर चले गए हैं बच्चे सोने!साथी, साँझ लगी अब होने!

Harivansh Rai Bachchan Poems | गीत मेरे

 गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ,वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ,छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन,गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ,और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ,कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण,गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।दूर कर मुझमें भरी तू कालिमा जब,फैल जाए विश्‍व में भी लालिमा तब,जानता सीमा नहीं है अग्नि का कण,गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।जग विभामय न तो काली रात मेरी,मैं विभामय तो नहीं जगती अँधेरी,यह रहे विश्‍वास मेरा यह रहे प्रण,गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।

Harivansh Rai Bachchan Poems | लहर सागर का श्रृंगार नहीं

 लहर सागर का नहीं श्रृंगार,उसकी विकलता है;अनिल अम्बर का नहीं खिलवारउसकी विकलता है;विविध रूपों में हुआ साकार,रंगो में सुरंजित,मृत्तिका का यह नहीं संसार,उसकी विकलता है।
गन्ध कलिका का नहीं उदगार,उसकी विकलता है;फूल मधुवन का नहीं गलहार,उसकी विकलता है;कोकिला का कौन सा व्यवहार,ऋतुपति को न भाया?कूक कोयल की नहीं मनुहार,उसकी विकलता है।
गान गायक का नहीं व्यापार,उसकी विकलता है;राग वीणा की नहीं झंकार,उसकी विकलता है;भावनाओं का मधुर आधारसांसो से विनिर्मित,गीत कवि-उर का नहीं उपहार,उसकी विकलता है।

Harivansh Rai Bachchan Poems | आ रही रवि की सवारी

 आ रही रवि की सवारी।
नव-किरण का रथ सजा है,कलि-कुसुम से पथ सजा है,बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी।आ रही रवि की सवारी।
विहग, बंदी और चारण,गा रही है कीर्ति-गायन,छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।आ रही रवि की सवारी।
चाहता, उछलूँ विजय कह,पर ठिठकता देखकर यह-रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।आ रही रवि की सवारी।

Harivansh Rai Bachchan Poems | चिडिया और चुरूंगुन

 छोड़ घोंसला बाहर आया,देखी डालें, देखे पात,और सुनी जो पत्‍ते हिलमिल,करते हैं आपस में बात;-माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया?’नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया’
डाली से डाली पर पहुँचा,देखी कलियाँ, देखे फूल,ऊपर उठकर फुनगी जानी,नीचे झूककर जाना मूल;-माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया?’नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया’
कच्‍चे-पक्‍के फल पहचाने,खए और गिराए काट,खने-गाने के सब साथी,देख रहे हैं मेरी बाट;-माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया?’नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया’
उस तरू से इस तरू पर आता,जाता हूँ धरती की ओर,दाना कोई कहीं पड़ा होचुन लाता हूँ ठोक-ठठोर;माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया?’नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया’
मैं नीले अज्ञात गगन कीसुनता हूँ अनिवार पुकारकोइ अंदर से कहता हैउड़ जा, उड़ता जा पर मार;-माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया?
‘आज सुफल हैं तेरे डैने,आज सुफल है तेरी काया’

Harivansh Rai Bachchan Poems | क्यों पैदा किया था?

 ज़िन्दगी और ज़माने कीकशमकश से घबराकरमेरे बेटे मुझसे पूछते हैं किहमें पैदा क्यों किया था?और मेरे पास इसके सिवायकोई जवाब नहीं है किमेरे बाप ने मुझसे बिना पूछेमुझे क्यों पैदा किया था?
और मेरे बाप को उनकेबाप ने बिना पूछे उन्हें औरउनके बाबा को बिना पूछे उनकेबाप ने उन्हें क्यों पैदा किया था?
ज़िन्दगी और ज़माने कीकशमकश पहले भी थी,आज भी है शायद ज्यादा…कल भी होगी, शायद और ज्यादा…
तुम ही नई लीक रखना,अपने बेटों से पूछकरउन्हें पैदा करना।

Harivansh Rai Bachchan Poems | तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण! / हरिवंशराय बच्चन 

 तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलाते हैं सितारे,वक्ष पर युग बाहु बाँधे, मैं खड़ा सागर किनारेवेग से बहता प्रभंजन, केश-पट मेरे उड़ाता,शून्य में भरता उदधि-उर की रहस्यमयी पुकारें,इन पुकारों की प्रतिध्वनि, हो रही मेरे हृदय में,है प्रतिच्छायित जहाँ पर, सिंधु का हिल्लोल – कंपन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं,आज लहरों में निमंत्रण!
विश्व की संपूर्ण पीड़ा सम्मिलित हो रो रही है,शुष्क पृथ्वी आँसुओं से पाँव अपने धो रही है,इस धरा पर जो बसी दुनिया यही अनुरूप उसके–इस व्यथा से हो न विचलित नींद सुख की सो रही है,क्यों धरणि अब तक न गलकर लीन जलनिधि में गई हो?देखते क्यों नेत्र कवि के भूमि पर जड़-तुल्य जीवन?तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
जड़ जगत में वास कर भी, जड़ नहीं व्यवहार कवि काभावनाओं से विनिर्मित, और ही संसार कवि का,बूँद के उच्छ्वास को भी, अनसुनी करता नहीं वह,किस तरह होता उपेक्षा-पात्र पारावार कवि का,विश्व-पीड़ा से, सुपरिचित, हो तरल बनने, पिघलने,त्याग कर आया यहाँ कवि, स्वप्न-लोकों के प्रलोभन।तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण। 
जिस तरह मरु के हृदय में, है कहीं लहरा रहा सर,जिस तरह पावस-पवन में, है पपीहे का छिपा स्वरजिस तरह से अश्रु-आहों से, भरी कवि की निशा मेंनींद की परियाँ बनातीं, कल्पना का लोक सुखकरसिंधु के इस तीव्र हाहाकार ने, विश्वास मेरा,है छिपा रक्खा कहीं पर, एक रस-परिपूर्ण गायन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण
नेत्र सहसा आज मेरे, तम-पटल के पार जाकरदेखते हैं रत्न-सीपी से, बना प्रासाद सुन्दरहै खड़ी जिसमें उषा ले, दीप कुंचित रश्मियों का,ज्योति में जिसकी सुनहरली, सिंधु कन्याएँ मनोहरगूढ़ अर्थों से भरी मुद्रा, बनाकर गान करतींऔर करतीं अति अलौकिक, ताल पर उन्मत्त नर्तन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
मौन हो गंधर्व बैठे, कर श्रवण इस गान का स्वर,वाद्य-यंत्रों पर चलाते, हैं नहीं अब हाथ किन्नर,अप्सराओं के उठे जो, पग उठे ही रह गए हैं,कर्ण उत्सुक, नेत्र अपलक, साथ देवों के पुरन्दरएक अद्भुत और अविचल, चित्र-सा है जान पड़ता,देव बालाएँ विमानों से, रहीं कर पुष्प-वर्णन।तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
दीर्घ उर में भी जलधि के, हैं नहीं खुशियाँ समाती,बोल सकता कुछ न उठती, फूल वारंवार छाती,हर्ष रत्नागार अपना, कुछ दिखा सकता जगत को,भावनाओं से भरी यदि, यह फफककर फूट जाती,सिन्धु जिस पर गर्व करता, और जिसकी अर्चना कोस्वर्ग झुकता, क्यों न उसके, प्रति करे कवि अर्घ्य अर्पण।तीर पर कैसे रुकूँ में, आज लहरों में निमंत्रण!
आज अपने स्वप्न को मैं, सच बनाना चाहता हूँ,दूर की इस कल्पना के, पास जाना चाहता हूँ,चाहता हूँ तैर जाना, सामने अंबुधि पड़ा जो,कुछ विभा उस पार की, इस पार लाना चाहता हूँ,स्वर्ग के भी स्वप्न भू पर, देख उनसे दूर ही था,किन्तु पाऊँगा नहीं कर आज अपने पर नियंत्रण।तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण,
लौट आया यदि वहाँ से, तो यहाँ नव युग लगेगा,नव प्रभाती गान सुनकर, भाग्य जगती का जगेगा,शुष्क जड़ता शीघ्र बदलेगी, सरल चैतन्यता में,यदि न पाया लौट, मुझको, लाभ जीवन का मिलेगा,पर पहुँच ही यदि न पाया, व्यर्थ क्या प्रस्थान होगा?कर सकूँगा विश्व में फिर भी नए पथ का प्रदर्शन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
स्थल गया है भर पथों से, नाम कितनों के गिनाऊँ,स्थान बाकी है कहाँ पथ, एक अपना भी बनाऊँ?विश्व तो चलता रहा है, थाम राह बनी-बनाईकिंतु इनपर किस तरह मैं, कवि-चरण अपने बढ़ाऊँ?राह जल पर भी बनी है, रूढ़ि, पर, न हुई कभी वह,एक तिनका भी बना सकता, यहाँ पर मार्ग नूतन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
देखता हूँ आँख के आगे नया यह क्या तमाशा -कर निकलकर दीर्घ जल से हिल रहा करता मना-सा,है हथेली-मध्य चित्रित नीर मग्नप्राय बेड़ा!मैं इसे पहचानता हूँ, हैं नहीं क्या यह निराशा?हो पड़ी उद्दाम इतनी, उर-उमंगे, अब न उनकोरोक सकता भय निराशा का, न आशा का प्रवंचन।तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
पोत अगणित इन तरंगों ने, डुबाए मानता मैं,पार भी पहुँचे बहुत-से, बात यह भी जानता मैं,किन्तु होता सत्य यदि यह भी, सभी जलयान डूबे,पार जाने की प्रतिज्ञा आज बरबस ठानता मैं,डूबता मैं, किंतु उतराता सदा व्यक्तित्व मेराहों युवक डूबे भले ही है कभी डूबा न यौवन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
आ रहीं प्राची क्षितिज से खींचने वाली सदाएँ,मानवों के भाग्य-निर्णायक सितारों! दो दुआएँ,नाव, नाविक, फेर ले जा, हैं नहीं कुछ काम इसका,आज लहरों से उलझने को फड़कती हैं भुजाएँप्राप्त हो उस पार भी इस पार-सा चाहे अंधेरा,प्राप्त हो युग की उषा चाहे लुटाती नव किरन-धन!तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

Harivansh Rai Bachchan Poems | है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? / हरिवंशराय बच्चन 

 कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना थाभावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था।
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारास्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना थाढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों कोएक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।
बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलमका बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरमप्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिराथी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला समवह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेलीएक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।
क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आईकालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाईआँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकतीथी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाईवह गई तो ले गई उल्लास के आधार, मानापर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।
हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागावैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगाएक अंतर से ध्वनित हों दूसरे में जो निरंतरभर दिया अंबर-अवनि को मत्तता के गीत गा-गाअंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए हीले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।
हाय, वे साथी कि चुंबक लौह-से जो पास आएपास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाएदिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकरएक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाएवे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वेखोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।
क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियानाकुछ न आया काम तेरा शोर करना, गुल मचानानाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसकाकिंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बतानाजो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम सेपर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना हैहै अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है।

Harivansh Rai Bachchan Poems | कौन मिलनातुर नहीं है ? / हरिवंशराय बच्चन 

 आक्षितिज फैली हुई मिट्टी निरन्तर पूछती है,कब कटेगा, बोल, तेरी चेतना का शाप,और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा शान्त ?कौन मिलनातुर नहीं है ?
गगन की निर्बन्ध बहती वायु प्रति पल पूछती है,कब गिरेगी, टूट, तेरी देह की दीवार,और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा मुक्त ?कौन मिलनातुर नहीं है ?
सर्व व्यापी विश्व का व्यक्तित्व प्रति क्षण पूछता है,कब मिटेगा, बोल, तेरे अहं का अभिमान,और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा पूर्ण ?कौन मिलनातुर नहीं है ?

Harivansh Rai Bachchan Poems | क्यों जीता हूँ / हरिवंशराय बच्चन 

 आधे से ज़्यादा जीवनजी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ-क्यों जीता हूँ?लेकिन एक सवाल अहमइससे भी ज़्यादा,क्यों मैं ऎसा सोच रहा हूँ?
संभवत: इसलिएकि जीवन कर्म नहीं है अबचिंतन है,काव्य नहीं है अबदर्शन है।
जबकि परीक्षाएँ देनी थींविजय प्राप्त करनी थीअजया के तन मन पर,सुन्दरता की ओर ललकना और ढलकनास्वाभाविक था।जबकि शत्रु की चुनौतियाँ बढ कर लेनी थी।जग के संघर्षों में अपनापित्ता पानी दिखलाना था,जबकि हृदय के बाढ़ बवंड़रऔ’ दिमाग के बड़वानल को शब्द बद्ध करना था,छंदो में गाना था,तब तो मैंने कभी न सोचाक्यों जीता हूँ?क्यों पागल साजीवन का कटु मधु पीता हूँ?
आज दब गया है बड़वानल,और बवंडर शांत हो गया,बाढ हट गई,उम्र कट गई,सपने-सा लगता बीता है,आज बड़ा रीता रीता हैकल शायद इससे ज्यादा होअब तकिये के तलेउमर ख़ैय्याम नहीं है,जन गीता है।

Harivansh Rai Bachchan Poems | दो पीढियाँ / हरिवंशराय बच्चन

 मुंशी जी तन्नाएपर जब उनसे कहा गया,ऎसा जुल्म और भी सह चुके हैंतो चले गए दुम दबाए।
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मुंशी जी के लड़के तन्नाए,पर जब उनसे कहा गया,ऎसा ज़ुल्म औरों पर भी हुआ हैतो वे और भी तन्नाए।

Harivansh Rai Bachchan Poems | एक नया अनुभव / हरिवंशराय बच्चन 

 मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक कविता लिखना चाहता हूँ।चिड़िया नें मुझ से पूछा, ‘तुम्हारे शब्दों मेंमेरे परों की रंगीनी है?’मैंने कहा, ‘नहीं’।’तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?”नहीं।”तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?”नहीं।”जान है?”नहीं।”तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?’मैनें कहा, ‘पर तुमसे मुझे प्यार है’चिड़िया बोली, ‘प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?’एक अनुभव हुआ नया।मैं मौन हो गया!

Harivansh Rai Bachchan Poem madhushala मधुशाला

मधुशालामृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
‘होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले’
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला’
‘और लिये जा, और पीये जा’, इसी मंत्र का जाप करे’
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ’ हाला,
धूमधाम औ’ चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ’ जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो ‘जय राम’ न मिलकर, कहा करो ‘जय मधुशाला’।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती ‘साकीबाला’,
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, ‘इसने, हा, छू दी मेरी हाला’,
कभी न कोई कहता, ‘उसने जूठा कर डाला प्याला’,
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ – अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया ‘जानेवाला’,
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उंढेला पात्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों – साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
‘और, और’ की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
‘बस अब पाया!’- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

‘आ आगे’ कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
‘दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!’।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
‘भाग्य प्रबल, मानव निर्बल’ का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता – हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया –
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया –
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

‘मय’ को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, ‘हाला’
‘मीना’ को ‘मधुपात्र’ दिया ‘सागर’ को नाम गया ‘प्याला’,
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
‘मय-महिफल’ अब अपना ली है मैंने करके ‘मधुशाला’।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिव्हा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

पिरिशष्ट से

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
– हरिवंशराय बच्चन

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