Akbar birbal story in hindi for class 3 -half prize-आधा इनाम

यह बात उस समय की है जब शहंशाह अकबर और बीरबल की पहली मुलाकात हुई थी। सभी बीरबल को महेश दास के नाम से जानते थे। एक दिन शहंशाह अकबर बाजार में महेश दास की बुद्धिमानी से खुश होकर उसे अपने दरबार में इनाम देने के लिए बुलाते हैं और निशानी के तौर पर अपनी अंगूठी देते हैं।

कुछ दिन के बाद महेश दास सुल्तान अकबर से मिलने का विचार बनाकर उनके महल की ओर रवाना हो गए । वहां पहुंचकर महेश दास देने देखा कि महल के बाहर बहुत लंबी लाइन लगी हुई है और दरबान हर व्यक्ति से कुछ न कुछ लेकर ही उन्हें अंदर जाने दे रहा है। जब महेश दास की बारी आयी, तो उसने कहा कि महाराज ने मुझे इनाम देने के लिए बुलाया है और उसने सुल्तान की अंगूठी दिखाई। दरबान के मन में लालच आ गया और उसने कहा कि मैं तुम्हें एक ही शर्त पर अंदर जाने दूंगा अगर तुम मुझे इनाम में से आधा हिस्सा दो तो।

दरबान की बात सुनकर महेश दास ने सोचा और उसकी बात मानकर महल में चले गए। दरबार में पहुंचकर वह अपनी बरी आने का इंतजार करने लगे। जैसे ही महेश दास की बारी आई और वो सामने आए, तो शहंशाह अकबर उन्हें देखते ही पहचान गए और दरबारियों के सामने उनकी बहुत तारीफ की। बादशाह अकबर ने कहा कि बोलो महेश दास इनाम में क्या चाहिए।

तक महेश दास ने कहा कि महाराज मैं जो कुछ भी मांगूगा क्या आप मुझे इनाम में देंगे? बादशाह अकबर ने कहा कि बिल्कुल, मांगों क्या मांगते हो। तब महेश दास ने कहा कि महाराज मुझे पीठ पर 100 कोड़े मारने का इनाम दें। महेश दास की बात सुनकर सभी को हैरानी हुई और बादशाह अकबर ने पूछा कि तुम ऐसा क्यों चाहते हो।

तब महेश दास उर्फ़ बीरबल ने दरबान के साथ हुई पूरी घटना बताई और अंत में कहा कि मैंने वादा किया है कि इनाम का आधा हिस्सा मैं दरबान को दूंगा। तब अकबर ने गुस्से में आकर दरबान को 100 कोड़े और लगवाए और महेश दास बीरबल की होशियारी देखकर अपने दरबार में मुख्य सलाहकार के रूप में रख लिया। इसके बाद अकबर ने उनका नाम बदलकर महेश दास से बीरबल कर दिया।

कहानी से सीख
हमें अपना काम ईमानदारी से और बिना किसी लालच के करना चाहिए। अगर आप कुछ पाने की उम्मीद से कोई काम करते हो, तो हमेशा बुरे परिणाम का सामना करना पड़ता है, जैसे इस कहानी में लालची दरबान के साथ हुआ।